Nari Shakti Vandan Adhiniyam Protest: 30 सितंबर को जगह नारी शक्ति वंदन अधिनियम की प्रतियां जलाकर इसके खिलाफ एक आंदोलन की शुरुआत, झारखण्ड के हजारीबाग़ में जहां हजारों लोगों की उपस्थिति में बिल को फाड़कर जलाया गया.
लेखक : एचएल दुसाध
(बहुजन डाइवर्सिटी मिशन के राष्ट्रीय अध्यक्ष)
न्यूज इंप्रेशन
Delhi : वर्षों से लंबित पड़ा महिला आरक्षण विधेयक एक नए नाम ’नारी शक्ति वंदन अधिनियम विधेयक’ के (Nari Shakti Vandan Adhiniyam Protest) रूप में बहुत आसानी से पास हो चुका है, जिसे लेकर भाजपा और विविधतामय भारत के जन्मजात सुविधाभोगी वर्ग में जश्न का माहौल है. किन्तु इनके विपरीत वंचित वर्ग के लोग सदमे में है. कारण इसमें ‘कोटा में कोटा’ की उनकी मांग को बुरी तरह दरकिनार कर दिया गया है. इससे आहत वंचित वर्गों के बुद्धिजीवी-एक्टिविस्ट इस विधेयक को सवर्ण महिला आरक्षण घोषित करते हुए, इसे ख़ारिज करने की लड़ाई में उतर आए हैं.
हजारीबाग में बिल फाड़कर जलाया
इसके तहत 30 सितम्बर से इसकी प्रतियां फाड़कर जलाने की जो घोषणा किया था, उसको कार्य रूप देना शुरू कर दिया है. इसकी बड़े पैमाने पर शुरुआत झारखण्ड के हजारीबाग़ से हुई, जहां हजारों लोगों की उपस्थिति में बिल को फाड़कर जलाया गया. वहीं देश के ढेरों लोग समूह में या व्यक्तिगत रूप से घरों में रहकर बिल की प्रतियाँ जलाकर उसे सोशल मीडिया पर वायरल किये. अकेले या सामूहिक रूप से बिल दहन का सिलसिला कुछ सप्ताह तक चलने के बाद लोग हजारो-लाखों की तादाद में सड़कों पर उतरेंगे, ऐसी घोषणा विधेयक विरोधी बुद्धिजीवियों की ओर से हो चुका है. मैं भी बिल विरोधी बहुजन संगठनों के विरोध का समर्थन करता हूँ और बिल विरोधियों का अनुसरण करते हुए मैंने भी घर पर रहकर इसका दहन किया!

विधेयक बुरी तरह निराश करता
नारी शक्ति वंदन विधेयक को दहन करने वालों में मेरे शरीक होने का खास कारण यह रहा कि यह एक ऐसे समय में आया है, जब महिला सशक्तिकरण के मोर्चे पर हम म्यांमार, नेपाल, भूटान, बांग्लादेश, श्रीलंका इत्यादि जैसे पिछड़े देशों से बहुत पीछे चले गए है और आज हम इस माममे में एशिया उपमहाद्वीप में सिर्फ अफगानिस्तान और पाकिस्तान से ही प्रतिद्वंदिता करने की स्थिति में ही रह गए हैं. इस स्थिति को देखते हुए नारी शक्ति वंदन विधेयक बुरी तरह निराश करता है. क्यों निराश करता है इससे अवगत कराने के लिए 2006 से वर्ल्ड इकॉनोमिक फोरम की ओर से हर वर्ष प्रकाशित हो रही ‘ग्लोबल जेंडर गैप’ की 2021 की रिपोर्ट को उद्धृत करना चाहूँगा. ‘ग्लोबल जेंडर गैप’ रिपोर्ट में स्वास्थ्य, शिक्षा, अर्थव्यवस्था और राजनीति के क्षेत्र में महिलाओं और पुरुषों के मध्य सापेक्ष अंतराल में हुई प्रगति का आकलन किया जाता है. यह आंकलन चार आयामों-आर्थिक भागीदारी और अवसर, शिक्षा का अवसर, स्वास्थ्य एवं उत्तरजीविता और राजनीतिक सशक्तीकरण-के आधार पर किया जाता है ताकि इस वार्षिक रिपोर्ट के आधार पर प्रत्येक देश स्त्री और पुरुषों के मध्य बढती असमानता की खाई को पाटने का सम्यक कदम उठा सके.
भारत 153 देशों में 112वें स्थान पर था
2021 में इसकी जो रिपोर्ट आई उसमें बताया गया था कि दक्षिण एशियाई देशों में भारत का प्रदर्शन सबसे खराब है. भारत रैंकिंग में 156 देशों में 140वें स्थान पर है, जबकि बांग्लादेश 65वें, नेपाल 106वें, पाकिस्तान 153वें, अफगानिस्तान 156वें, भूटान 130वें और श्रीलंका 116वें स्थान पर. रिपोर्ट में नंबर एक पर आइसलैंड, दो पर फ़िनलैंड, तीसरे पर नार्वे, चौथे पर न्यूजीलैंड और 5 वें पर स्वीडेन रहा. इससे पहले 2020 की इसकी रिपोर्ट में भारत 153 देशों में 112वें स्थान पर था।
वरिष्ठ और प्रबंधकीय पदों पर महिलाओं की हिस्सेदारी 6 प्रतिशत
भारत के लगातार पिछड़ते जाने के कारणों पर प्रकाश डालते हुए ग्लोबल जेंडर गैप-2021 की रिपोर्ट में कहा गया था, ’इस साल भारत का जेंडर गैप 3 प्रतिशत बढ़ा है। अधिकांश कमी राजनीतिक सशक्तीकरण उप-सूचकांक पर देखी गई है, जहां भारत को 5 प्रतिशत अंक का नुकसान हुआ हैं। 2019 में महिला मंत्रियों की संख्या 23.1 प्रतिशत से घटकर 9.1 प्रतिशत हो गई है। महिला श्रम शक्ति के भागीदारी दर में भी कमी आई है, जो 8 प्रतिशत से घटकर 22.3 प्रतिशत हो गई है। पेशेवर और तकनीकी भूमिकाओं में महिलाओं की हिस्सेदारी घटकर 2 प्रतिशत रह गई है। वरिष्ठ और प्रबंधकीय पदों पर भी महिलाओं की हिस्सेदारी कम है। इनमें से केवल 6 प्रतिशत पद महिलाओं के पास हैं और केवल 8.9 प्रतिशत फर्म महिला शीर्ष प्रबंधकों के पास हैं। भारत में महिलाओं द्वारा अर्जित आय पुरुषों द्वारा अर्जित की गई केवल 1/5वीं है। इसने भारत को वैश्विक स्तर पर बॉटम 10 में रखा है। बहरहाल 2021 की ग्लोबल जेंडर गैप रिपोर्ट में जो सबसे भयावह बात कही गयी थी वह यह कि भारत की आधी आबादी को पुरुषों की बराबरी में आने में, खासतौर से आर्थिक रूप से, 257 साल से अधिक लगेंगे. इसके पहले 2019 की रिपोर्ट में 202 साल लगने की बात कही गयी थी. भारत की आधी आबादी को पुरुषों की बराबरी में आने में ढाई सौ साल से अधिक लगेंगे, इस तथ्य ने बता दिया था कि भारत ही नहीं, संभवतः पूरे विश्व की सबसे बड़ी समस्या भारत में लैंगिक असमानता है. उस समय भारत की आबादी 130-से 135 करोड़ थी, जिनमें महिलाओं की संख्या प्रायः 65 करोड़ थी और 65 करोड़ की आबादी में यूरोप के प्रायः तीन दर्जन देश और अमेरिका जैसे दो देश समा जायेंगे. बहरहाल ग्लोबल जेंडर गैप की रिपोर्ट ने 65 करोड़ की संख्या वाली आधी आबादी के पिछड़ेपन को नए सिरे से संधान करते हुए इनकी समानता की दिशा में अभूतपूर्व कदम उठाने की ऐतिहासिक जिम्मेवारी मोदी सरकार के कंधो पर डाल दी थी. जिससे इसके कारणों की तह में जाकर इससे पार पाने की हिमालय सरीखी चुनौती सरकार के समक्ष खड़ी हो गयी थी.

शक्ति के स्रोतों में लैंगिक विविधता पर काम ही नहीं किया
इस चुनौती को ध्यान में रखते हुए मोदी सरकार यदि इसके उत्पत्ति के कारणों की तह में जाती तो पाती भारत सहित पूरे में विश्व में लैंगिक असमानता का सम्बन्ध मानव जाति की उस सबसे बड़ी समस्या, ‘आर्थिक और सामाजिक गैर-बराबरी से है’, जिसकी उत्पत्ति शक्ति के स्रोतों आर्थिक, राजनैतिक, शैक्षिक और धार्मिक-के विभिन्न सामाजिक समूहों के पुरुषों और उनकी महिलाओं के मध्य असमान बंटवारे से होती रही है. जहाँ तक शक्ति के स्रोतों के बंटवारे का सवाल है, हजारों साल से ही दुनिया के हर देश का शासक वर्ग ही कानून बनाकर शक्ति के स्रोतों का वितरण करता रहा है. पर, यदि हम यह जानने का प्रयास करें कि सारी दुनिया के शासकों ने किस पद्धति का अवलंबन कर शक्ति के स्रोतों का असमान बंटवारा कराया तो हमें विश्वमय एक विचित्र एकरूपता दिखती है. हम पाते हैं कि दुनिया के सभी शासक ही शक्ति के स्रोतों में सामाजिक और लैंगिक विविधता का असमान प्रतिबिम्बन करा कर ही, इस समस्या की सृष्टि करते रहे है. शक्ति के स्रोतों में सामाजिक और लैंगिक विविधता के असमान प्रतिबिम्बन से ही मानव जाति की सबसे बड़ी समस्या, ‘आर्थिक और सामाजिक गैर-बराबरी के साथ लैंगिक असमानता’ की सृष्टि होती रही है, पूरा विश्व इसकी ठीक से उपलब्धि बीसवीं सदी के उत्तरार्द्ध में ही कर पाया. इसकी सत्योपलब्धि करके ही विषमता-मुक्त समाज बनाने व आधी आबादी को उसका प्राप्य दिलाने के लिए बीसवीं सदी के उत्तरार्द्ध से लोकतान्त्रिक रूप से परिपक्व ब्रिटेन, कनाडा, अमेरिका, फ़्रांस, न्यूजीलैंड, ऑस्ट्रेलिया , मलेशिया, नॉर्डिक देशों ने अपने-अपने देश में सामाजिक और लैंगिक विविधता के प्रतिबिम्बन में होड़ लगाया और दुनिया को बेहतर बनाने का रास्ता दिखाया. शक्ति के स्रोतों में विविधता की नीति अख्तियार करने के फलस्वरूप वहां आधी आबादी के लिए शक्ति के स्रोतों आधा अर्थात 50 प्रतिशत शेयर पाने का मार्ग प्रशस्त हुआ. इस तरह वहां महिला सशक्तिकरण का दौर चल पड़ा और महिलाएं बिना किसी भेदभाव के पुरुषों के समान सिर्फ नौकरियों और राजनीति की संस्थाओं में ही नहीं सप्लाई, डीलरशिप, ठेकेदारी, फिल्म मीडिया, छोटे-बड़े प्रबंधकीय पदों इत्यादि में अवसर पाने लगीं. इससे वैसे देश वर्ल्ड इकॉनोमिक फोरम द्वारा निर्धारित चारों आयामों-आर्थिक भागीदारी और अवसर, शिक्षा का अवसर, स्वास्थ्य एवं उत्तरजीविता और राजनीतिक सशक्तीकरण-पर खरा उतरने लगे. किन्तु भारत में ऐसा इसलिए नहीं हो पाया क्योंकि यहाँ के शासकों ने शक्ति के स्रोतों में लैंगिक विविधता के प्रतिबिम्बन पर काम ही नहीं किया.
महिला वर्ग की सामाजिक विविधता की अनदेखी
जहां तक वर्तमान मोदी सरकार का सवाल है यदि उसे ग्लोबल जेंडर गैप रिपोर्ट आई शर्मनाक स्थिति की चिंता होती तो वह इससे पार पाने के लिए अमेरिका और यूरोपीय देशो की बांटी न सिर्फ तमाम क्षेत्रों में लैन्हिक विविधता लागू कराने लायक पालिसी बनाती, बल्कि समस्त क्षत्रों में सबसे पहले 50 प्रतिशत हिस्सा आधी आबादी को सुनिश्चित कराने प्रयास करती. लेकिन हिन्दुत्ववादी मोदी सरकार हिन्दू धर्म शास्त्रों द्वारा सदियों से शक्ति के सभी स्रोतों से बहिष्कृत आधी आबादी के हित में अवसरों के बंटवारे में अनिवार्य रूप से लैंगिक विविधता लागू करने की नीति अख्तियार न कर सकी. भविष्य में जब जाति जनगणना होगा तो पता चलेगा कि मोदी और उनकी पूर्ववर्ती सरकारों ने महिलाओं को एक वर्ग मानते हुए, उनके हित में जो नीतियां बनायीं उसका अधिकतम लाभ सवर्ण महिलाओं को मिला. इसी नीति का अनुसरण करते मोदी सरकार ने जो ‘नारी शक्ति वंदन अधिनियम’ पारित किया है, उसमें कोटा में कोटा अर्थात महिला वर्ग की सामाजिक विविधता की बेरहमी से अनदेखी कर दिया है, जिसके फलस्वरूप इसका अधिकतम सुफल सवर्ण समुदाय की महिलाओं को मिलने का मार्ग प्रशस्त हो गया है. यही कारण है कि बहुजन बुद्धिजीवी इसे ‘सवर्ण महिला आरक्षण विधेयक’ करार देते हुए इसकी प्रतियां दहन का काम शुरू कर दिए हैं, जिसमें मैं भी शामिल हो गया.
विधेयक के खिलाफ आर-पार की लड़ाई
बहरहाल जो बहुजन बुद्धिजीवी ‘नारी शक्ति वंदन विधेयक’ के खिलाफ आर-पार की लड़ाई का मन बना लिए हैं, उन्हें इस लड़ाई को महज गैर-सवर्ण वंचित महिलाओं को संसद-विधानसभाओं में वाजिब हिस्सेदारी तक सिमिति नहीं रखना चाहिए. उन्हें उन चार आयामों को धयान में रखकर लड़ाई लड़नी होगी, जिसके आधार पर ग्लोबल जेंडर गैप ने भारत की आधी आबादी को असमानता का सर्वाधिक शिकार बताया है. इसके लिए राजनीति के साथ उनको समस्त आर्थिक, शैक्षिक और धार्मिक गतिविधियों में प्राथमिकता के साथ लैंगिक विविधता लागू करवाने पर अपने आन्दोलन को केन्द्रित करना होगा. साथ में लैंगिक विविधता में सामाजिक विविधता को भी ध्यान में रखना होगा. भारत की सामाजिक विविधता एससी, एसटी, ओबीसी, धार्मिक अल्पसंख्यक और सवर्ण समुदाय के रूप में परिलक्षित होती है. इस हिसाब से शक्ति के समस्त स्रोतों में आधी आबादी की जो हिस्सेदारी सुनिश्चित होगी उसमे दलित, आदिवासी, पिछड़े, अल्पसंख्य और सवर्ण समुदायों के संख्या अनुपात अवसरों का बंटवारा सुनिश्चित करवाना होगा. और इसमें सबसे पहले क्रमशः एससी, एसटी, ओबीसी, अल्पसंख्यक समुदायों की महिलाओं को अवसर देना होगा, क्योंकि ये सर्वाधिक वंचित हैं : शेष बचा अवसर ही सवर्ण महिलाओं को देना होगा, क्योंकि वे सुविधाभोगी से आती हैं तथा अबतक की सरकारों महिलाओं ने एक वर्ग मानकर जो भी थोड़ा बहुत अवसर दिया है, उसका शेष भाग इन्ही के हिस्से में आया है. ऐसे में यदि ‘नारी शक्ति वंदन अधिनियम’ के खिलाफ आन्दोलनरत बहुजन बुद्धिजीवी और राजनीतिक दल भारत की आधी आबादी को 257 सालों के बजाय 57 सालों में पुरुषों की बराबरी लाने के प्रति इच्छुक हैं तो निम्न क्षेत्रों में क्रमशः दलित, आदिवासी, पिछड़े, अल्पसंख्यक और सवर्ण समुदायों को प्राथमिकता के साथ 50 प्रतिशत हिस्सेदारी सुलभ कराना सर्वोत्तम उपाय साबित हो सकता है-ः
दस सूत्री अजेंडे में शक्ति के समस्त स्रोत
1- सेना व न्यायालयों सहित सरकारी और निजी क्षेत्र की सभी स्तर की, सभी प्रकार की नौकरियों व धार्मिक प्रतिष्ठानों।
2- सरकारी और निजी क्षेत्रों द्वारा दी जानेवाली सभी वस्तुओं की डीलरशिप।
3- सरकारी और निजी क्षेत्रों द्वारा की जानेवाली सभी वस्तुओं की खरीदारी।
4- सड़क-भवन निर्माण इत्यादि के ठेकों, पार्किंग, परिवहन।
5- सरकारी और निजी क्षेत्रों द्वारा चलाये जानेवाले छोटे-बड़े स्कूलों, विश्वविद्यालयों, तकनीकि-व्यावसायिक शिक्षण संस्थाओं के संचालन, प्रवेश व अध्यापन।
6- सरकारी और निजी क्षेत्रों द्वारा अपनी नीतियों, उत्पादित वस्तुओं इत्यादि के विज्ञापन के मद में खर्च की जानेवाली धनराशि।
7- देश-विदेश की संस्थाओं द्वारा गैर-सरकारी संस्थाओं (एनजीओ)को दी जानेवाली धनराशि।
8- प्रिंट व इलेक्ट्रोनिक मिडिया एवं फिल्म-टीवी के सभी प्रभागों।
9- रेल-राष्ट्रीय मार्गों की खाली पड़ी भूमि सहित तमाम सरकारी और मठों की खली पड़ी जमीन व्यावसायिक इस्तेमाल के लिए अस्पृश्य-आदिवासियों में वितरित हो। 10- ग्राम-पंचायत, शहरी निकाय, संसद-विधासभा की सीटों; राज्य एवं केन्द्र की कैबिनेट; विभिन्न मंत्रालयों के कार्यालयों, विधान परिषद-राज्यसभा, राष्ट्रपति,राज्यपाल एवं प्रधानमंत्री व मुख्यमंत्री के कार्यालयों के कार्यबल इत्यादि में…
उपरोक्त दस सूत्री अजेंडे में शक्ति के समस्त स्रोतों के साथ ग्लोबल जेंडर गैप द्वारा चिन्हित वे चार आयाम भी आ जायेंगे, जिनकी पूर्ती कर भारत की आधी आबादी को सही मायने में लैंगिक न्याय दिलाने के साथ पुरुषों की बराबरी पर लाने का लक्ष्य साधा जा सकता है.